रे मानव

रे मानव चल,आहिस्ता चल,धीरे से चल
मंजिले हो चाहे कोसों दूर, जरा संभल
मुश्किलों में सम्भलना इतना आसान नहीं
सरल पथ पर चलना कोई इम्तिहान नहीं
लाख कठिनाईयां आयेंगी चलकर
सामना करना होगा उसे डटकर
सपनों की दुनिया से दूर ,घर से निकल
रे मानव चल….
मीठे बोलों से हृदय आँगन को हरसा ले
अमिय सरिता की धार जीवन में बरसा ले
कुछ न रह जायेगा अंत में प्यारे
जीवन इक साधना हैं मिलकर सँवारे
छल कपट की दुनिया से दूर,सबको बदल
रे मानव चल……
दुनिया बहुत बड़ी है हर खेल यहाँ निराली है।
दाँव पेंच रच फंसे जनता कितनी भोली भाली है।
भोलेपन से लुटे हैं लुटिया सारी
अजब तमाशे और दुनियादारी
राम बचाये हमें रखे कोसों दूर,अकेले चल
रे मानव चल…
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