पिंडदान और गाँव का घर
गाँव का घर
अब नहीं रहा
हो गया है खंडहर
किन्तु जाने क्यों इधर
आये दिन सपने में
आता है गाँव का घर
एकदम साफ़ सुथरा
गोबर और कनई से
गोबरी करने के पश्चात्
पिरोड़ मिट्टी से पुती हुई दीवारें
गोबर से लीपा हुआ
बड़ा सा आंगन
आंगन में बिछी हुई खटिया
खेलते बच्चे
मचिया पर बैठी बड़ी अम्मा – दादी
साफ –साफ दिखते हैं सपने में
बाहर ओसारे में बैठे सुतरी कातते
हरवाहे से कुछ बात करते पिता
किन्तु कुछ भी नहीं दिखता
खुलते ही आँख
टूट जाता है सपना
न दिखते हैं पिता
न दिखता है घर
लोग कहते हैं
दिवंगत लोगों का बार-बार
सपने में आना दर्शाता है
भटक रही है कहीं उनकी आत्मा
तर्पण करो पितर पक्ष में
पिंडदान करो उनके नाम
फिर नहीं दिखेंगे वे
मुक्ति मिल जायेगी उन्हें
क्या सचमुच भटक रही है
मेरे घर की आत्मा
क्या यही कारण है
कि बार-बार सपने में आता है घर
यदि ऐसा है तो
मैं नहीं करूँगा कोई तर्पण
नहीं करूँगा कोई पिंडदान
कि सपने में भी न दिखे
मेरे पिता , मेरा घर ,मेरा गाँव
दरअसल मैं चाहता हूँ देखना
प्रत्येक रात ऐसा सपना
जहाँ कुछ समय रह सकूँ
इस शहरी वातावरण से तटस्थ
अपने कुटुम्ब के आगोश में
पिता की छाँव में
अपने निर्मल गाँव में













