दूजा न कबीरा

पुण्य सरोवर में, हर उपवन में,
आकाशी इस आँगन में ।
लिए पसार प्रीत, अनुबंध गीत,
क्षणिक क्षुब्ध सी वेदना में।
पुलक भये शरीर,ना हो अधीर,
हो चुप दग्ध पुकार सुनो।
मग्न हो जयकार, करें स्वीकार,
हे मानव तनिक तो गुनों।
पाकर बड़भागी,अति अनुरागी,
अनुरंजन अनुवर्तन करें।
निद्रित अंधजाल,हमको निकाल,
दह में भी संवर्धन करें।
धन्य धर्ता धाम,कबीर सुनाम,
संभूति सुज्ञानी मिले।
सत्कीर्ति सत्कार्य,जग स्वीकार्य,
सत्संगी जगत को मिले।
(छन्द विधान-त्रिभंगी)
@ *आनन्द सिंघनपुरी*, *छत्तीसगढ़*
सचल-९९९३८८८७४७
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