Author: आनंद सिंघनपुरी
कैसी व्यथा
सुन प्रभो हर लो दुख त्रासरे। फिर कभी न दिखे यह घाव रे।। यह सभी जन की बहती दशा। कर सके हल ना यह दुर्दशा।। *************** ...
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