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लघु कथा
Home›साहित्य›लघु कथा›माँ का हृदय

माँ का हृदय

By डॉ.शैल चन्द्रा
December 8, 2022
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माँ
जब से होश संभाला है तब से माँ ने मुझे कुछ न कुछ दिया है।प्यार- ममता तो वे मुझ पर लुटाती ही हैं।छोटा था तो वे मेरे हाथ में चॉकलेट-टॉफी देकर मुझे बहलाती थीं। थोड़ा बड़ा हुआ तो मेरे हाथों में कुछ पैसे देकर मुझे स्कूल भेजती थीं। किशोर हुआ तो मैं खुद ही जिद करके पैसे मांग लेता था। माँ चुपचाप मुझे रुपए दे देती थीं।
         जब मैं कॉलेज पढ़ने शहर के बाहर जाने लगा तो माँ मठरी,लड्डुओं के साथ मुझे रुपए भी पकड़ा देती । यह कहते हुए कि -‘परदेश में तेरे काम आएंगे।’ बाबूजी माँ को डांटते थे कि -‘बेटे को बिगाड़ रही हो। फिजूल खर्ची की आदत डाल रही हो। ‘तब माँ हंसकर मुझे दुलारकर और भी पैसे मेरे हाथों में पकड़ा दिया करती थी।
      माँ ने अब मेरी शादी धूमधाम से कर दी है। बड़े अरमानों से चांद जैसी बहू लाई है। आज बाबूजी इस दुनिया में नहीं हैं। माँ बिल्कुल अकेली हो गईं हैं।अब मैं इस घर का मालिक बन गया हूँ। मेरी शानदार नौकरी है फिर भी मैं माँ की छोटी-छोटी जरूरतों को अनदेखा कर देता हूँ।
       उस दिन माँ ने अपना टूटा हुआ चश्मा दिखाते हुए कहा”-बेटा, जरा चश्मा बनवा देना।” यह सुनकर मेरी पत्नी ने गुस्से से बिफरते हुये कहा-“मांजी ,आपका खर्च बेवजह बढ़ जाता है। अभी कुछ दिन पहले तो नया चश्मा बनवाया था। सम्भाल के रख नहीं सकतीं आप?”
      यह सुनकर माँ चुप हो गईं। तभी पत्नी ने मुझसे कहा-“सुनो जी, माँ जी को अब दवाईयां या फल देने की कोई जरूरत नहीं है। बुढ़ापे में तो सब बीमार पड़ते ही हैं फिर हमारा खर्च भी बढ़ने वाला है । नया मेहमान हमारे घर आने वाला है।”
       पत्नी की यह बात मुझे भी सही लगी।
      अब माँ को सूखी रोटियां और दाल उपेक्षापूर्वक दी जाने लगी। अब माँ चुप ही रहने लगीं।
      आज माँ एक छोटा सा बक्सा लेकर मेरे पास आईं और मुझसे कहा-“बेटा, इस बक्से में सोने के जेवर हैं जो मैं अब नहीं पहनती । इसे तुम रख लो । तुम्हारे काम आएंगे।आज मैं यह घर छोड़कर वृद्धा आश्रम जा रही हूं। तुम लोगों पर मैं बोझ बनना नहीं चाहती। तुम लोग खुश रहो।” यह कहती हुई मां चली गईं।
        मैं अपने हाथों में माँ के दिये हुये उस बक्से को देख रहा था।
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